महंगाई की मार से जूझती परंपरागत स्वर्ण कारीगरी, रोजी-रोटी पर हर घड़ी मंडराता संकट
सुशील कुमार स्वामी
जौनपुर।वैश्विक बाजार में सोने और चांदी के दाम जिस बेतहाशा गति से बढ़े हैं, उसका असर अब केवल निवेश और बड़े कारोबार तक सीमित नहीं रहा। इस महंगाई ने आम आदमी की थाली के साथ-साथ छोटे कारीगरों की दुकानों को भी सूना कर दिया है। उत्तर प्रदेश के जौनपुर जैसे शहर, जहां पीढ़ियों से स्वर्ण कारीगरी ही जीवनयापन का आधार रही है, वहां आज वही कारीगर सबसे गहरे संकट का सामना कर रहे हैं।
जौनपुर की संकरी गलियों में कभी हथौड़ी की टन-टन और भट्ठी की आग से रौनक रहती थी। कारीगर दिन-रात मेहनत कर गहनों में जान डालते थे। लेकिन जब एक तोला सोना आम ग्राहक की पहुंच से बाहर हो जाए, तो न गहनों की मांग बचती है और न ही कारीगर की कला की कद्र।
आज हालात यह हैं कि शादी-ब्याह जैसे पारंपरिक अवसरों पर भी लोग भारी गहनों के बजाय हल्के, दिखावटी या नकली आभूषणों को तरजीह दे रहे हैं। बड़े ब्रांडेड शोरूम ईएमआई और मशीन से बने गहनों के सहारे किसी तरह बाजार में टिके हैं, जबकि छोटे सुनार, कारीगर और पारंपरिक दुकानें लगभग वीरान हो चुकी हैं। कई कारीगरों को दिनभर बैठने के बाद भी एक भी ऑर्डर नहीं मिल पाता।
इस महंगाई का सीधा असर उनकी रोजी-रोटी पर पड़ा है। जहां पहले एक कारीगर महीने में सम्मानजनक आमदनी कर लेता था, आज वही परिवार का खर्च चलाने के लिए संघर्ष कर रहा है। कई कारीगर मजबूरी में मजदूरी, रिक्शा चलाने या अन्य अस्थायी कामों की ओर रुख कर चुके हैं। पीढ़ियों से चली आ रही यह पारंपरिक कला अब टूटने के कगार पर खड़ी है।
सरकारी हस्तक्षेप और बदलाव की जरूरत
ऐसे हालात में सबसे बड़ा सवाल यही है कि इन कारीगरों के लिए रास्ता क्या है?
सबसे पहले सरकार को इस संकट को गंभीरता से लेना होगा। जैसे हथकरघा, बुनकर और कुटीर उद्योगों के लिए विशेष योजनाएं चलाई जाती हैं, उसी तरह स्वर्ण और चांदी कारीगरों के लिए भी अलग सहायता पैकेज की जरूरत है। सस्ते ऋण, कार्यशील पूंजी और जीएसटी में राहत देकर इन्हें संबल दिया जा सकता है।
दूसरी ओर, कारीगरों को भी समय के साथ खुद को ढालना होगा। भारी और पारंपरिक गहनों के साथ-साथ हल्के वजन के आभूषण, डिजाइनर चांदी के गहने और कस्टमाइज्ड ऑर्डर आज के बाजार की मांग बन चुके हैं। कम वजन में आकर्षक डिजाइन ही नया अवसर बन सकता है।
डिजिटल बाजार और स्थानीय ब्रांडिंग पर जोर
डिजिटल और सहकारी मॉडल अपनाना अब समय की मांग है। यदि छोटे कारीगर मिलकर सहकारी समितियां बनाएं और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म के माध्यम से अपने उत्पाद बेचें, तो बिचौलियों पर निर्भरता कम हो सकती है। स्थानीय प्रशासन और उद्योग विभाग को प्रशिक्षण और तकनीकी सहयोग देकर इस दिशा में पहल करनी चाहिए।
नकली गहनों से प्रतिस्पर्धा करने के बजाय कारीगरों को अपनी असली पहचान पर जोर देना होगा। हाथ से बने, शुद्धता वाले और पारंपरिक डिजाइनों को “जौनपुर की कारीगरी” जैसे नाम से ब्रांड किया जा सकता है, जिससे न केवल बाजार बढ़ेगा बल्कि कारीगरों को सम्मान भी मिलेगा।
अध्ययन: चांदी की रिकॉर्ड महंगाई और भारत की चुनौती
चांदी की रिकॉर्ड महंगाई केवल गहनों तक सीमित समस्या नहीं है। विशेषज्ञों का मानना है कि भारत को विदेशी खनन साझेदारियों के जरिए चांदी की दीर्घकालीन आपूर्ति सुनिश्चित करनी होगी। साथ ही, तैयार चांदी के आयात पर निर्भरता कम करने के लिए घरेलू रिफाइनरी और रीसायक्लिंग क्षमता को बढ़ावा देना जरूरी है।
आज चांदी की सुरक्षा उतनी ही महत्वपूर्ण होती जा रही है जितनी ऊर्जा सुरक्षा। सोने के विपरीत, चांदी की आपूर्ति श्रृंखलाएं अपेक्षाकृत कम पारदर्शी हैं, जो बढ़ती वैश्विक मांग के साथ एक बड़ी रणनीतिक कमजोरी बनती जा रही हैं। भारत दुनिया में तैयार चांदी का सबसे बड़ा उपभोक्ता है, लेकिन प्रोसेसर नहीं।
चांदी की मांग केवल आभूषण निर्माण तक सीमित नहीं है। इलेक्ट्रॉनिक्स, सौर ऊर्जा, चिकित्सा उपकरण और अन्य औद्योगिक उपयोगों में इसके बढ़ते इस्तेमाल ने कीमतों को और ऊपर धकेला है। यही कारण है कि आने वाले समय में चांदी की महंगाई कारीगरों और उपभोक्ताओं दोनों के लिए और बड़ी चुनौती बन सकती है।
यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो यह संकट केवल जौनपुर ही नहीं, बल्कि पूरे प्रदेश से पारंपरिक स्वर्ण-चांदी कारीगरी को धीरे-धीरे खत्म कर सकता है। यह नुकसान सिर्फ कारीगरों का नहीं, बल्कि हमारी सांस्कृतिक विरासत का भी होगा।