सलाम मछलीशहरी ने मछलीशहर को साहित्यिक नक्शे पर दिलाई एक स्थायी पहचान

Belal Jani
By -


जौनपुर।मछलीशहर ज़िले का एक पुराना और ऐतिहासिक क़स्बा है जिसकी मिट्टी में तहज़ीब, इल्म और हुनर की खुशबू सदियों से रची-बसी है। इसी मिट्टी ने ऐसे अनगिनत लोग पैदा किए हैं, जिन्होंने देश और दुनिया में इस छोटे से क़स्बे का नाम रोशन किया। इसी कड़ी में एक उजला और बेहद सम्मानित नाम है उर्दू के प्रसिद्ध शायर सलाम मछलीशहरी का जो न सिर्फ़ अपने फ़न से पहचाने गए, बल्कि मछलीशहर को साहित्यिक नक्शे पर एक स्थायी पहचान दिला गए।

सलाम मछलीशहरी का असली नाम अब्दुस्सलाम था। उनका जन्म 1 जुलाई 1921 को मछलीशहर में हुआ। उनके पिता का नाम अब्दुल रज़्ज़ाक था। प्रारंभिक शिक्षा उन्होंने मछलीशहर और फैज़ाबाद में प्राप्त की। बाद में इलाहाबाद विश्वविद्यालय की लाइब्रेरी में कार्य करते हुए उन्होंने साहित्य और भाषाओं का गहन अध्ययन किया जो आगे चलकर उनकी शायरी की बुनियाद बना।

साल 1943 में वे लखनऊ पहुंचे और ऑल इंडिया रेडियो में स्क्रिप्ट राइटर बने। लगभग आठ वर्षों तक यहाँ सेवा देने के बाद वर्ष 1951 में वे श्रीनगर रेडियो स्टेशन में असिस्टेंट प्रोड्यूसर नियुक्त हुए। इसके बाद 1954 में उन्हें दिल्ली रेडियो स्टेशन में प्रोड्यूसर की ज़िम्मेदारी मिली। कुछ समय बाद वे दोबारा लखनऊ रेडियो लौटे और अंततः दिल्ली आकर बस गए,जहाँ से उन्होंने अपनी पेशेवर और साहित्यिक यात्रा को नई ऊँचाइयों तक पहुँचाया। सलाम मछलीशहरी तरक्कीपसंद शायरी के मज़बूत स्तंभ थे। उनकी ग़ज़लों में सादगी,खालिस जज़्बात और संजीदगी की ऐसी महक मिलती है,जो नौजवानों के दिलों को सीधा छू जाती है। उनकी कई ग़ज़लों को मशहूर गायक जगजीत सिंह ने अपनी आवाज़ दी,जिसके बाद सलाम साहब का नाम घर-घर पहुँचा। इंदौर के शायर अज़ीज़ इंदौरी ने उनकी शख्सियत पर शोध कर“सलाम मछलीशहरी: शख्सियत और फ़न” नामक किताब भी लिखी,जो उनके फ़न की गहराई और प्रभाव को दर्शाती है।भारतीय साहित्य में उनके योगदान को देखते हुए भारत सरकार ने उन्हें 24 मार्च 1973 को तत्कालीन राष्ट्रपति वीवी गिरी के हाथों पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित किया जो मछलीशहर की मिट्टी के लिए भी एक ऐतिहासिक पल था।

कस्बे के स्थानीय इतिहास में रूचि रखने वाले जो यहाँ के महत्वपूर्ण व्यक्तियों की जीवनियों को दर्ज करने का काम इन दिनों शाज़िल फ़राज़ कर रहे हैं। शाज़िल फ़राज़ लंबे समय से कस्बे से जुड़ी पुरानी जानकारियाँ, दस्तावेज़, तस्वीरें और मौखिक इतिहास एकत्र कर रहे हैं। जिनकी कोशिश है कि मछलीशहर के बारे में उपलब्ध पुराने रिकॉर्ड को सही रूप में संजोकर आने वाली पीढ़ियों तक पहुँचाया जाए उन्होंने बताया कि मेरी कोशिश है कि आगे चलकर मछली शहर के इतिहास पे एक किताब लिखूं जो आने वाली पीढ़ियों के लिये महत्वपूर्ण साबित हो।

मछलीशहर में जिस सड़क से होकर वे अपने घर जाया करते थे,नगर पंचायत ने उसी मार्ग को उनके सम्मान में सलाम मछलीशहरी रोड नाम दिया है। यह नाम आज भी उनके फ़न और शख्सियत की यादें जीवित रखे हुए है। आज ही के दिन 19 नवंबर 1973 सलाम मछलीशहरी इस फ़ानी दुनिया को अलविदा कह गए थे। लेकिन उनका असर,उनकी शायरी और उनका हुनर आज भी पाठकों के दिलों में उतनी ही मजबूती से ज़िंदा है। वे सिर्फ़ एक शायर नहीं मछलीशहर की पहचान,उसका अभिमान और आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा हैं।

उनकी एक प्रसिद्ध ग़ज़ल के चंद अशआर
रात दिल को था सहर का इंतिज़ार

अब ये ग़म है क्यूँ सवेरा हो गया



पूछिए उस से ग़म-ए-साज़-ए-ख़ुलूस

चार ही दिन में जो रुस्वा हो गया



बुझ गई कुछ इस तरह शम-ए-'सलाम'

जैसे इक बीमार अच्छा हो गया।